मैं एक कामगार
संस्थान सरकारी हो या गैर सरकारी, छोटा हो या बड़ा, स्वदेशी हो या विदेशी सभी जगह श्रमिकों का विशेष महत्व है, इनके अभाव में कोई भी देश तरक्की नहीं कर सकता, इतिहास गवाह हैं कि जिन देशों ने भी कामगारों के महत्व को समझा है, उन्हीं देशों ने बुलंदी की ऊंचाइयों को छुआ हैं, एक कामगार जो अपना संपूर्ण जीवन किसी संस्थान या संगठन के लिए समर्पित कर देता है, लेकिन फिर भी उसे वह मान सम्मान प्राप्त नही हो पाता, जिसका वह असल मायने में हकदार होता हैं,आज भी कामगारों को कुछ लोग तुच्छ नजर से देखना पसंद करते हैं, कदम-कदम पर कामगारों के साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है, मानसिक प्रताड़नाये दी जाती है, जानबूझकर तनाव ग्रस्त रखने की साजिशें रची जाती है, जो गन्दी मानसिकता को दर्शाती है, इसे बदलने की आवश्यकता है, यह पुस्तक किसी एक कामगार की व्यथा नहीं है, बल्कि समस्त कामगारों के मन की पीड़ा बया करने वाली हैं, इस पुस्तक द्वारा किसी भी संस्थान या विशेष को नीचा दिखाने या टारगेट करने का प्रयास बिल्कुल नहीं किया गया हैं, पुस्तक का मकसद समाज में फैली कुछ विसंगतियों से लोगों को जागरूक कराना है, फिर भी यदि किसी सज्जन को मेरे द्वारा लिखे किसी भी शब्द या वाक्य से कोई पीड़ा होती हैं, तो में छमा प्रार्थी हूँ, कृपया कोई भी महानुभाव व्यर्थ का दिमाग ना लगाये, सभी के सोचने-समझने का नजरिया अलग-अलग हो सकता है, इसमें कोई संदेह नही, देश के विभिन्न संस्थानों में कार्यरत कामगारों में प्रतिभा कूट-कूट कर भरी पड़ी है, आवश्यकता है तो उन्हें पहचानने ओर निखारने की, आजादी मिलने के इतने साल बाद भी कामगारों की दुर्दशा दिन प्रतिदिन सुधरने की जगह बिगड़ती ही जा रही हैं।
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यह पुस्तक कामगारों के महत्व, उनके संघर्ष, सम्मान और कार्यस्थल से जुड़ी सामाजिक विसंगतियों के प्रति जागरूकता पर केंद्रित है।